अब दर्द ढँकने को सिवाए हँसी बाकी क्या रहा
सबकी खामोशी ने कसर बाकी जो थी पूरी कर दी
अबकी सर्दी में सिवाए बेबसी बाकी क्या रहा...
थी मंजिल तेरी झलक हर सफ़र की जुस्तुजू की
जो तेरा वादा ना रहा फिर इरादा बाकी क्या रहा
हो नही जो तुम मेरे हमदम मेरा अंजामे सफर
फिर भर सफर बेचैनी से ज्यादा बाकी क्या रहा...
भले कदरदान कई हों तराने महफ़िल के मगर
जो मेरे दिल को न छुए तो फिर असर बाकी क्या रहा
हो दिलकश लाख मगर नज्म जो किसी और पर हो
तब तेरे जिक्र के दीगर सुनने को पर बाकी क्या रहा...
कभी सोचता हुँ कि ना अब और करूँ याद तुझको
कुछ सताती यादों के सिवा तेरा यहाँ बाकी क्या रहा
पर नासमझ दिल युँ तेरा अक्स लिए बैठा है कि अब
तुझमें खोते जाने के सिवा और जहाँ बाकी क्या रहा...
इस कदर खुद को लुटा चूका हूँ तेरी आशिकी पे
एक दफा और मिटने में तड़प बाकी क्या रहा
तु नही तो फिर बुतों सी है मेरी ज़िन्दगी भी
रूह के होने न होने में फरक बाकी क्या रहा...

