सूरज रोज़ ढलता है
चांद रोज़ छिपता है
मैं क्यों ढल या छिप नहीं सकता
मैं तो रोज रोज मरता हूं
फूल रोज खिलता है
भंवरा रोज़ गुनगुनाता है
मैं क्यों खिल या गुनगुना नहीं पाता
मैं तो रोज रोज मुरझाता हूं
सांसें मैं रोज़ लेता हूं
जल भी रोज़ मैं पीता हूं
फिर क्यों नहीं मैं गा या जी सकता
शायद मुझे अभी जीना नहीं आता है!!!
*शब्दाशं*
