मैं कोई प्यार व्यार नहीं समझता

किसी दूसरे को अपना संसार नहीं समझता

रेशमी धागों की गांठों में इजहार नहीं समझता

सालभर में एक बार जो निभाया जाए

उसे मैं कोई अपना त्यौहार नहीं समझता


अपनत्व आस्था श्रद्धा और विश्वास फलित हो जहां

भाई बहन के बीच में न ठहरता हो कोई आसमां

ऐसे ही ख़यालों को मैं समझ पाता हूं

और बगैर रिवाजों के धर्म अपना निभाता हूं!!!


*शब्दाशं*