कभी हो रूब़रू दिल में, मुझे अपना बुलाती है।

कभी वो ख़्वाब मे आकर, सहज़ ही मुस्कुराती है।

पपीहा दिल ज़िसे ढूंढे विकल स्वाति की बूंदों सा,

क़लम से कल्पनाओं तक, वही तो गुनगुनाती है।


अरुण शुक्ल अर्जुन

(पूर्णत: मौलिक स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित)