सोचता हूं कि तुम पर एक किताब लिखूं,

सोते जागते तुझमें देखा वो ख्वाब लिखूं।

लिखूंगा कि पहले-पहल हम मिले थे जब,

जो दिल में उफनाया था वो सैलाब लिखूं।


मैं लिखूंगा कि तुम डुबो देती हो मस्ती में।

तुम एक गुलाब सी महकती हो बस्ती में।

किसी पुराने नग्मे सी लहराती सुरीली धुन।

जैसे पायल सी बजती हो छनन-छुन-छुन।


इतनी सी शर्त है कि तुम 'तुम' हो जाओ,

मुझे वैसे ही देखो जैसे देखती थी पहले,

जब भी आंखें मिलाऊं मैं तुमसे अब से,

ख्वाब पहले से दिख जायें रंगीन रुपहले।