काश तुमने एक बार मुड़ के देखा होता उन आंसुओं को जो गिर के भी टूटे नहीं उन होंठों को जो सिले थे अपनी ही जुबान से उन लफ़्ज़ों को जो बोलने से पहले ही दफ़न हो गए उन आँखों को जो पलकें नहीं झपकाती और उस दिल को जो धड़कना भूल गया हो काश तुमने एक बार मुड़ के देखा होता आंसुओं से जमी बर्फ में दफ़न ज़िंदा लाश को साँसों की गर्मी से झुलसी आहों को पत्थर हुई आँखों से बहते हुए खून को पत्ते के समान कांपते हुए जिस्म को और बिना खून बहे कटते हुए अंगों को काश तुमने एक बार मुड़ के देखा होता आवाज़ ने नहीं मेरे साँसों ने तुम्हे पुकारा था आँखों ने नहीं मेरी रूह ने तुम्हे निहारा था हाथों ने नहीं मेरे रोयें रोयें ने तुम्हे छुआ था होंठों को दांतों ने नहीं दाँतों को होंठो ने काटा था और दिल को धड़कनों ने नहीं आसुओं ने समझाया था काश तुमने एक बार मुड़ के देखा होता