यह मैंने किसके लिए लिखा

अपने आप से पूछती हूँ

क्यूँ लिखा यह भी सवाल करती हूँ

शायद लोग मुझे मेरे काम के लिए जाने इसलिए

शायद यह करना मुझे पसंद है इसलिए

या फिर कुछ और...


यह बात जो मैं कहना चाहती हूँ

पहली बार तो नहीं कही जा रही

फिर भी यह कहना सही क्यूँ है

या फिर कहा नहीं जाना चाहिए


मानो जैसे मैं अपनी छोटी सी रौशनी लिए

एक जगमगाते भ्रमांड का सितारा

मेरी न होने से कुछ फर्क भले ही न पड़े

पर होने से उजाला तिनका भर बड़े


उसी तिनका भर रौशनी के वास्ते

बनाए हैं मैंने खुद के लिए यह रास्ते

क्यूँ और शायद की दुनिया से आगे

बुनकर शब्दों के धागे


लिखना अब इक जज्बा बन गया है

कईं प्रेरकों का सानिध्य जो मिला है

ये राहें हैं हम राहगीर

बनाते हैं शब्दों की तस्वीर