गली-गली, डगर-डगर
क्या शाम, क्या सहर
चल रहे हैं धुन में हम
बड़ी लम्बी है अपनी सफ़र
अनजान-सी इस राह में
दुश्वारियां हजार हैं
कई उलझनें, कई अरचनें
रोकने को तैयार है
कहीं पे गहरी खाई है
तो कहीं पे तीखे मोड़ भी
कहीं हार का सन्नाटा
कहीं रंगीनियों के शोर भी
भटक न जाएं ये कदम
कभी तो दिल घबराता है
जो लगे ठोकरें, चुभे हों कांटे
चुपके-से आंसू बहाता है
जब असह्य पीड़ा में तपकर
पग सहमा-सा रुक जाता है
उठो, चलो हे कर्मवीर! कह
कोई साथी हाथ बढ़ाता है
घायल इस मन को भी हरदम
एक अनकही सी आस है
कि जिस मुक़ाम की हमें
इतनी शिद्दत से तलाश है
नज़र न आता हो मगर
दूर होकर के भी पास है
कहते हैं कि गर मंज़िल हो हसीं
तो रास्ते कि परवाह कैसी
नाकामियों से जो डर जाए
पाने की वो चाह कैसी
अब रुकेगा न ये कारवां
स्वयं से ही यह वादा है
ऐ मंजिल! तुझे पाकर रहूं मैं
बस एक यही इरादा है।
-आरती गिरि

