आ चले आ
भीगी-भीगी रात में वो तन्हा सफ़र
खोए थे हम, खोई-खोई सी थी डगर
ख्यालों की 'बाढ़' थी, ख्वाबों की लहर
बढ़ रहे थे कदम हसरतों के संग
कसक थी दिल में कुछ छुट जाने की मगर
सामने थी मंजिलें, पिछे था वो शहर
वो गलियां, वो बगीचे, वो पनघट, वो नहर
बीता था जहाँ बचपन का सुनहरा वो पहर
सूने से घरौंदे का विरान आंगन
मानो पुकार रहा हो मुझको रह-रहकर
रुक जा ओ परिंदे, न जा यूं छोड़कर
आ चले आ लौट के, पुकार रहा है तेरा घर।

