कुछ न कुछ तो कर ही लेंगे,
यूँ हाथों पे हाँथ धरे बैठे न रहेंगे,
हाँ,
एक काश रोकने आता हैं मुझे,
हर जगह,
और मायूस होकर लौट जाता है,
हर बार,
यह काश ....
मेरे आत्मविश्वास से बड़ा
कभी नहीं होगा।

हर बार वह यही सुनने,
मन के द्वार खटखटाता है,
झकझोरता है, बौखलाता है,
ये वो भी जानता है,
कि हर बार हारेगा वो
और फिर भी,
गर्व है उसे मुझ पर,
हर बार कह जाता है!

-तृषा