कितने है परेशां ये बताने नही आते,
अब हमको किसी तरह सताने नहीं आते,,
हम जैसे है वैसे ही नज़र आते है सबको,
चेहरे पे हमको चेहरे चढ़ाने नही आते,,
साहिल से देखते है तमाशा खड़े होकर,
हम डूबते है हमको बचाने नही आते,,
यादो में तेरी जागते रहते है रात भर,
पहले की तरह सपने सुहाने नही आते,,
जिस दिन भी पुकारोगे चले आएंगे हमदम,
औरो की तरह हमको बहाने नही आते,,
ना जाने किस कसूर की मुझको मिली है सजा,
महफ़िल को मेरी अब वो सजाने नही आते,,
बैठे है याद बनकर मेरे दिल में आज भी,
हमको वो परिन्दे भी उड़ाने नही आते,,


