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नक़ाब- ग़ज़ल

 
कितने है परेशां ये बताने नही आते,
अब हमको किसी तरह सताने नहीं आते,,
हम जैसे है वैसे ही नज़र आते है सबको,
चेहरे पे हमको चेहरे चढ़ाने नही आते,,
साहिल से देखते है तमाशा खड़े होकर,
हम डूबते है हमको बचाने नही आते,,
यादो में तेरी जागते रहते है रात भर,
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