मिरे दुख का तू अंदाज़ा लगा दे ख़ुशी को अपनी ख़ुद ही तू मिटा दे   हवा इतराए फिरती हैं जो ख़ुद पर अगर हिम्मत हो सूरज को बुझा दे   सितारे सिसकियाँ भरते है शब-भर कभी तो आँख भी ग़म का पता दे   दिल-ए-बीमार को रश्क-ए-मसीहा जो हो मक़बूल अब ऐसी दुआ दे   मुक़ाबिल से चला ये कौन उठकर के जैसे शम-ए-दिल कोई बुझा दे