क्या लिखूँ जो मेरी भावनाएं समझा दे,

क्या लिखूँ जो मेरे अंतर्द्वंद को सुलझा दे

क्या लिखूँ जो उसको मेरा बना दे,

क्या लिखूँ जो उसको मुझसे मिला दे

क्या लिखूँ जो उस तक मेरे हर रास्ते बना देक्या लिखूँ जो उसको मेरे होने का एहसास दिला दे

क्या लिखूँ जो आज तक मैने ना लिखा होक्या लिखूँ जो आज तक उसके लिए मैने ना कहा हो

 

एक बात कहूँ, एक राज़ कहूँमैं अपने दिल का हाल कहूँ

अगर सुनते हैं तो सुन ले सब, क्यूँ मैं डर कर अब मैं खामोश रहूँ

इस प्रथम प्रेम के नये सफ़र में

मैं अपने इश्क़ का एलान करूँ, एक नये इतिहास का निर्माण करूँ

 

वो मुझको अच्छी लगती है , कुछ चंचल सी कुछ चुपचुप सी

कुछ पागल सी लगती है 

हैं चाहनेवाले और बहुत पर उसमे है एक बात बहुत

वो अपनी अपनी सी लगती है

वो सच्ची सच्ची सी लगती है 

 

कहते हैं सब लोग यहाँ की क्या तुमने कभी इश्क़ को समझा है

किया क्या है जीवन में और कहाँ से ये ख्याल जनमा है

कुछ तुम अपना इलाज करो

कुछ हमारा भी लिहाज़ करो

लेकिन अब हुमको कहाँ कुछ बोध रहा था

तीर तरकश छोढ़ चुका था

अध उगी मूछो पर ताव के साथ

मैं साला जवान हो चुका था

 

अब तो हर रोज़ दीदार का इंतेज़ार था,

दुपट्टे की आड़ से नॅज़ारो का टकरार था

उनका अदा के साथ इतराना हमरी साँसे अटका रहा था

शर्म--हया का हुजूम उनके चेहरे पर दीवाली मना रहा था

 

खनकती मुस्कान कानो को छू रही थी

नन्ही बिंदी माथे को चूम रही थी

झुमके अलग मदहोशी में झूम रहे थे

गाल गुलो की तरह खिल रहे थे

उड़ती जुल्फ का एक हिस्सा आँखो में काजल लगा रहा था

अमृत का वो मंज़रफीका सारा जहाँ होता जा रहा था  

 

फिर एक शाम आईजब वो सामने से मिलने आई

उस दिन हवा का रंग अलग था,

ख़यालो के बगीचे में फूल खिला था

सोचा आज तो उसको गुलदस्ता दे दूँगा

तमाम शब्दो को पिरो दूँगा

निशब्द कर दूँगा उसको उसकी परिभाषा से

स्तब्ध कर दूँगा उसको अपनी अभिलाषा से और कह दूँगा उससे

कि मैं वर्ण तुम वर्णमाला हो

मैं आग तो तुम ज्वाला हो

मैं बच्चा हूँ तुम किल्कारी हो

मैं समुद्रा तो तुम नाड़ी हो

 

मैं मस्तिष्क हूँ तुम विचार हो

मैं जीवन, तुम जीने का सदाचार हो

मैं स्वर तुम सरगम हो

मैं अंत तुम उदगम हो

मैं अकेलापन तुम मित्र हो

मैं गुलाब तुम मेरा इत्र हो

मैं तबला हूँ तुम थाप हो

मैं लखनऊ तुमपहले आपहो

मैं पहली विदेश यात्रा तुम उसका घमंड हो

मैं अमित शाह तुम मोदी की तरह प्रचंड हो

मैं पराठा तुम आचार हो

मैं मुनाफ़ा तुम कारोबार हो

मैं पुरानी स्कॉच तुम उसका नशा हो

मैं शनि तुम उसकी दशा हो

मैं शिव हूँ तुम शक्ति हो

मैं कवि तुम मेरी अभिव्यक्ति हो

मैं प्यास हूँ तो तुम सोमरस पानी हो

तुम ही मेरे अधूरे जीवन की पूरी कहानी हो

 

बहुत कुछ था और कहने के लिए पर उसे देख कर भूल गया

सुनहरी तितली के पीछे भागते बच्चे की तरह मैं उसकी खूबसूरती में खो गया

हुस्न में हर रोज़ इज़ाफ़ा हो रहा था

सांझ का नारंगी रंग खिल रहा था

उसका चेहरा पलको के पीछे चल रहा था

अधखुली आँखो से सूरज छान्न रहा था

बारिशे बालो में क़ैद थी

बूँदें की लड़ी लंबी गर्दन पर नदी की तरह थी

पतली कलाईयो में चूड़ियों की मीठी आवाज़ थी

पायलो की धुन भी उस संगीत के साथ थी

 

मैं आज भी उस संगीत में डूबना चाहता हूँ

उस लम्हे को बार बार जीना चाहता हूँ

आज भी वो सावन सा चेहरा तलाशता हूँ

आज भी अपनी रूह में उस खुशी को झँकता हूँ

ऐसा नहीं की मैं उसके जीवन से अनभिज्ञ हूँ

ऐसा नहीं की मैं उससे कुछ अलग हूँ

बस जीवन इस संघर्ष में हम दोनो कट से गये हैं

ज़रूरतो की दहाड़ में सहमी ख्वाहिशें के बीच कुछ भटक से गये हैं

पर मुझे विश्वास है की फिर सावन आएगाफिर प्रकृति का सृजन उसकी रोशिनी से होगा

 
और मैं उस वक़्त फिर लिखूँगा... उसकी निर्भीक हस्ती को अर्पित हो जाऊँगा