भीगा भीगा, बुझा बुझा सा नासाज़ दिल… जैसे बारिश का अख़बार
धुली हुई स्याही और एहसासो की लुगदी का साथ… सिमटा सिकुडा बोझिल सा हो चला
टपकती बूँदें धूमिल शब्द, हर चित्र एक दूसरे में मिला
अंतर्मंन के आँगन में किसी कोने में रख कर मैं बढ़ गया
धूप निकालने क इंतेज़ार में अख़बार मेरा रह गया
शाम को लौटा तो अख़बार पर पड़ी नज़र
सोचा क्या है कुछ नया, कुछ तो हुआ होगा इधर उधर
टटोलें ज़रा अख़बार को देखे तो क्या है छपा
समस्त विचारो ने आज क्या नवीन रचा
झूठ की अलमारी के पास … अपने काले पानी में ठिठुरा पड़ा था
ऊपर से कुछ सूखा अंदर से अबतक नम हो रहा था
किनारे उसके फट चुके थे
मुड़े हुए पन्ने आद्रता से चिपक चुके थे
एक अफवाह दूसरे समाचार पर आ रही थी
विज्ञापनों की भीड़ होली मना रही थी
कहीं मिटते हुए ‘राष्ट्र’ का अधूरे ‘खेल’ में समावेश था
कहीं अपनो का अपनो के लिए संदेस था
थी कहीं अर्थव्यवस्था ओर राज़व्यवस्था पर बहती हुई टिप्पणी
तो वहीं कुछ अक्षरो से झाँकती रोज़गार और जीवन को सुधारती सीख नयी
कुछ गीले पन्ने पुरानी कहानियो से भरे थे
तमाम लेखक अपने शब्दो से बड़े थे
दो के लेखन में मर्म था, एक के में कर्म था,
तो एक का मिज़ाज भी गर्म था
कई पढ़नेवालो की भी रिसती भावनाएं थीं
धुँधलाते हुए भविष्य और राशिफल की भी परछाई थी
बुद्धि में नहीं आ रहा था कि कौन सी खबर पढूँ
कोई तो प्रष्ठ होगा जिसको मैं समझ सकूँ
ये उधेड़ बुन रात भर चलता रहा
नये अख़बार को प्रकाशित करने का समय हो चला
सोचा फिर निकलेगी धूप आएगा फिर अख़बार
और ये वाला अख़बार रद्दी हो चला
अब इस अख़बार का ना कोई मूल्य है
सिर्फ़ बिछाने और झाड़ने के तुल्य है
फिर भी हर पन्ना अपने में एक रोचक कहानी है
रे अख़बार तेरी एक ही दिन की ज़िंदगानी है


