कभी कभी जिन्दगी ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर देती है कि हम समझ नहीं पाते कि हमें क्या करना चाहिए। सबकुछ बिखरा-बिखरा सा लगता है, खासकर तब जब अपना ही जीवन साथी न समझे, आपको क्या चाहिए उससे भौतिक सुख तो सब मिल जाते हैं जो जीवन में आज की नारी के लिए बहुत सरल है, परन्तु जीवन साथी का साथ, प्यार और विश्वास यदि न मिले तो वो क्या करे। शारिरिक सुख तो मात्र छलावा है, क्या एक नारी को अपने जीवनसाथी का प्यार पाने का हक भी नहीं है, क्या उसे उस परिवार द्वारा अपनाया भी नहीं जा सकता जबकि वह अपना परिवार माता पिता और सब रिश्तों को छोड़ कर आई है। उसे सिर्फ घर में एक काम करने वाली स्त्री की भांति क्यों समझा जाता है ? सब उसकी ही जिम्मेदारी है, जिम्मेदारी तक तो ठीक है बात सिर्फ जिम्मेदारी की नहीं है बात उसके स्वाभिमान की है। यदि वह सम्पूर्ण जिम्मेदारी योग्यता से उठाती है तो क्या उसे हक नहीं कि उसके साथ प्यार के दो शब्द ही कोई बोले। बंद करो ये सब नाटक कि ये तो हमारी बेटी के समान है, उसे बेटी के समान नहीं अपनी बेटी मानो और उसके जीवन साथी को भी उसे प्यार से रहना चाहिए वो आपकी जीवन संगिनी है आपके घर पर काम करने वाली बाई नहीं। सोच बदलो देश बदलेगा।