एक कली गर तोड़ लो ,दूजा फूल फिर खिल जायेगा, दो बूँद सागर से निकालो,क्या ख़त्म हो जायेगा? नक्षत्र टूटे और गिरे ,फिर भी कमी दिखती नहीं, कुछ शाख़ कट गइ पेड़ से,नइ शाख़ फिर उगती वहीं, एसा ही संबन्ध है,एक कवि से उसकी कल्पना का, काग़ज़ पे उकरे अक्षरों से,ह्रदय से उठती वेदना का, अक्षर किसी के तोड़ तुम,नया गीत लिख सकते नहीं, किसी कवि की कल्पना ,बेशक चुरा सकते हो पर, किसी कवि की कल्पना तक ,तुम पहुँच सकते नहीं, एक माँ जैसे की अपने ,अंश को जीवंत करती, प्यार से पुचकार से ,हाँथों से उसके रंग गढ़ती, वैसे ही भावों मे अपने,प्राण लेखक फूँकता है, हर कड़ी मे प्यार रख,ममता से उसके देखता है, जब अपने शब्दों का महल,दूजे के हाँथों मे दिखे, कोइ मर गया जैसे हो भीतर,दर्द आँखों मे दिखे, नोच लो जज़्बात पर,वो तुम पे सज सकते नहीं , किसी कवि की कल्पना ,बेशक चुरा सकते हो पर, किसी कवि की कल्पना तक ,तुम पहुँच सकते नहीं, कैसे अपनी आत्मा से ,न्याय कर पाते हो तुम, जब किसी की प्रार्थना,हाँथों मसल कर घूमते हो, लेखनी को और की,अपनी बताकर गर्व से, तालियों पर झूठ की,शोहरतों को चूमते हो, अन्याय है ये तुम डरो,अंत इसमें नित्य है, सत्य था जो जन्म से,वो अंत तक भी सत्य है, ये पाप करके खुद से तुम,नज़रें मिला सकते नहीं , किसी कवि की कल्पना ,बेशक चुरा सकते हो पर, किसी कवि की कल्पना तक ,तुम पहुँच सकते नहीं,