शर्म, हया, सही, गलत, कसमें, वादे । पल भर में बदलते हैं इरादे कुछ भी महत्वपूर्ण न रहता जब लालच चित्त में बसता   मनुजता क्षीण पड़ जाती बुध्दि व्यग्र हो जाती तृष्णा कम नही होती कुटिलता थम नहीं पाती   भाषा प्यार की खोती अपयश के बीज को बोती आत्मा फूट के रोती सदा ही झूट को सहती   मस्तक निष्प्राण हो जाता हृदय पाषाण बन जाता स्वार्थ ही धर्म बन जाता छल ही कर्म बन जाता   कोई अपना नही कहता कोई अपना नही रहता ध्यान तो वित्त में फसता जब लालच चित्त में बसता। जब लालच चित्त में बसता।