एक भ्रमर भ्रमो से भ्रमित हुआ पुष्प प्रेम में हिय द्रवित हुआ   मोहक सुगंध में मोहित हो वह बुद्धि से मंद हुआ ज्यों ही मुरझाया वह कुसुम भवरा अंदर ही बंद हुआ   सरल सौम्य मधुर मधुकर मोहपाश ही बना मृत्यु कर   निश्चल मन विदीर्ण हुआ जो अब भ्रमर प्रसून संबंध नहीं जो अग्नि प्रज्वलित हुई उर में अब उसको शीतल गंध नही