नदी पर कविता:
नदी की धारा बहती जाये,
पानी की रवानी कहती जाये।
कल-कल, छल-छल बोले पानी,
गीत धरा का वो गा रही कहानी।
हरी-भरी नदी के किनारे,
चिड़ियों की चहक उठती सारे।
मछलियां करतीं जल में क्रीड़ा,
नदी का संगीत लगता निराला।
बड़े-बड़े पेड़ों की छाया में,
नदी सजी है हरे आँचल में।
कभी धीर, कभी वेग से बहती,
जीवन का संदेश सबको सुनाती।
उजले जल से धूप खेले,
कभी चिकने पत्थरों से मेले।
कभी लहरों में उठती उछाल,
नदी की गति में सुखद कमाल।
नदी का जल, जीवन की ज्योत,
मानव, पशु, कृषि की भी छोट।
पर इंसान ने इसे किया प्रदूषित,
भूल गया वो इसका मूल्य असीमित।
आओ मिलकर हम ये करें वादा,
नदियों को हम रखेंगे निर्मल आज और सदा।
ये प्रकृति का अनमोल उपहार,
नदियों को बचाएं हमारा है यह विचार।
नदी का पानी अमृत समान,
इसे रखना होगा साफ़, हमें हर इंसान।
जल ही जीवन का आधार है,
नदी को स्वच्छ रखना हमारा कर्तव्य और अधिकार है।
कविता के इन पंक्तियों में नदी की महत्ता, सौंदर्य और उसके संरक्षण का संदेश समाहित है।