भाग्यरेख
पुस्तक पढ़ते हुए बालक ने
पूछा था पिता से
' कर्म और भाग्य के बीच की दूरी कितनी?'
' कई राजमार्गों जितनी ' कहा था मजदूर पिता ने
देखा था मैंने, वो नम आँखों से
देख रहा था अपनी हथेलियों पर
अंकित भाग्यरेख को
कि वह जानता था इन्हें मिटाने की कोशिश में
कभी कभी मिटना होता है स्वयं भी
यह करते हुए वह सहला रहा था
अपने हृदय को
जिसपर बंधे थे ज्यों के त्यों
राजमार्गों के किनारे मिलने वाले
कई मील के पत्थर !
मौलिक एवंं अप्रकाशित
अर्चना आनंद भारती

