मौत को गले लगाना नही खुशहाली  हैं  ... मजबूर हो लटका किसान "कंगाली"  हैं  ...| सूखी  फसल जो   दृष्टि डाली तड़प  गया " हाय !" जैसे  बेटे की  मिट्टी  पाली ! नष्ट  हुई  मात्र  कमाई कौन करेगा  अब  भरपाई ? देख पड़ी खाली अनदाता  की  थाली हैं.. आज  भूखी  रह गई  प्यारी बीमार दुधमुई लाली हैं मौत को गले लगाना नही खुशहाली  हैं  ... क्या जन क्या जनसेवक सबने विपदा बढ़ाई धन्नासेठों  की हुई  कमाई कर्जमाफी बनी हँसाई हैं मजबूर हो लटका एक नही लाखों किसानों कीआत्महत्या की चीख़ती सच्ची कहानी  हैं मगर ठेठ  बैठी सत्ता की बईमानी  हैं मौत को गले लगाना नही खुशहाली  हैं मजबूर हो लटका किसान " कंगाली " हैं  ...|