किसी दिन वो रोई नहीं।
उसी दिन उसने गूंथ लिए आंसू,
चोटी के साथ।
तनी चोटी गर्दन से लटकाए, वो घूमती रही मोहल्ला,
देर शाम तक।
रास्ते में मिली उलाहनाएं, भद्दी गालियां,
पान खाए मुहों से बजबजाती खीसे.
टांक ली चोटी में, फूल की तरह।
लौटते वक्त, मिले जो ताने,
तरेरती नज़रे, बेमानी सवाल,
बांध लिए चोटी में गजरे की तरह।
देर रात, जब खींची उसने चोटी,
मरोड़ी गर्दन,
मसल गया फूल,
टूट गया गजरा,
सूख गएं आंसू,
बची रही चोटी।
उठाई उसने कैंची, काट डाली चोटी।
फिर वो रोई नहीं, किसी भी दिन।
-अपर्णा दीक्षित


