-जब मन की बेचैनी चुपचाप थम जाती है।


दिन चाहे

कितना ही लंबा क्यों न हो —

कंधों पर उलझनों का भार,

घंटों की थकन,

अनकहे सवालों की किरचें आँखों में समेटे —

फिर भी,

हर दिन की भागती साँसें

कहीं न कहीं

एक उम्मीद पर थम जाती हैं।

जब सूरज

अपने सुनहरे पाँव समेट

क्षितिज की चादर में लिपटने लगता है,

और धूप, धीरे-धीरे

अपने तीखे स्वरों को मौन में बदल देती है —

तब आता है

एक ख़्याल..

एक सर्द, सुकून भरी दस्तक की तरह —

शाम आएगी...

अपने आँचल में समेटे

थोड़ा ठहराव,

थोड़ी नमी,

थोड़ा ‘अब और कुछ मत सोचो’ जैसी राहत।

यह ख़्याल

कितना खूबसूरत होता है —

कि चाहे दिन

कितना भी असहनीय रहा हो,

शाम, अपनी शीतल हथेलियों से

मन के ताप को छूकर

उसे सुला देगी।

शाम...

जैसे माँ की गोद —

जहाँ दुनिया की सबसे कठिन यात्रा भी

कुछ देर को

आँखें मूँद लेने जितनी आसान लगती है।