माया की नगरी में हूँ ,
फिर भी इस पर हावी हूँ ;
स्वीकार नहीं अधर्म मुझे ,
हाँ कह लो मैं एक "बागी"हूँ।
हर बन्धन से मुक्त हूँ मैं ,
हर षड्यंत्र पर भारी हूँ ;
स्वीकार नहीं पराजय मुझे,
हाँ कह लो मैं एक "बागी" हूँ ।
नदी की उल्टी धार हूँ मैं ,
समय की गतिशीलता हूँ;
स्वीकार नहीं यूं थम जाना मुझे ,
हाँ कह लो मैं एक "बागी" हूँ।
-अपराजिता


