ज़िंदगी की कड़ी धूप जब झुलसाने लगे मुझे,शाम की ठंडी चादर सा मुझपर छा जाना तुम!!चेहरे पर उभरने लगें जब मेरे दर्द की तहरीरें,महक़ी हवाओं सा मुझे छूकर सहला जाना तुम!!© अनु उर्मिल 'अनुवाद'
ज़िंदगी की कड़ी धूप जब झुलसाने लगे मुझे,शाम की ठंडी चादर सा मुझपर छा जाना तुम!!चेहरे पर उभरने लगें जब मेरे दर्द की तहरीरें,महक़ी हवाओं सा मुझे छूकर सहला जाना तुम!!
© अनु उर्मिल 'अनुवाद'