ये दिन ढला वो रात हुयी,
समां बदलता जाता है,
जो सुबह थी, वो शाम हुयी।
ये बचपन था , वो भागी जवानी,
ये सुबह थी ,वो शाम सुहानी,
अब ढलते दिन पर रात आयी।
कभी चांद संग नींद आती नहीं ,
कभी तारों भरी रात जाती नही,
रतजगे है उम्र के, शमा चैन पाती नहीं ।
तू मुझसे ना यूं शिकवे कर ,
बदलेगा वक्त न यूहीं डर,
साये भी ढलतें है शामों-सहर।
न तू , न मै ; न समां रहे,
था वक्त, अब भी वक्त ही रहे,
गुमां न हो अक्स पर, खाक हैं,
खाक ही रहें।
( C ) अनु


