दिन ढले ,तन्हा यहां आया न करो, रतजगे यूही महफिलों में जगाया न करो। हर बेगाने से गाफिलाना इजहारे मुहब्बत न करो, ये नैमत सरे राह दीवानगी में जाया न करो।
ए सितमगर क्या नज़र करूं हाल ए दिल, तुम इशारों को हर आम पर यूं खास न करो। हर मुहब्बत की नजर से यूहीं शिकवा न करो, सुलगती शमा से ये गुजारिशी आहें न भरो। इस दौर-ए-वफा में आप बस ये इल्ज़ाम न लें, खंजर कातिल से बड़ा हो ये मुमकिन ही नही।