मनगढ़ंत बातें हैं ये सब
या फिर अब भी,
महसूस होता है
तेरा होना।
पुराने किताब के पन्नों में
हमेशा से कैद किरदारों को
ढूंढते समझते,
कवि की कल्पनाओं में
अंगड़ाई लेती साँसों के
बिखरते सिमटते,
किसी शायर के लहजे में
बेबाक उछाले राज़ को
उलटते पलटते,
ख्वाब बोना।
मनगढ़ंत बातें हैं ये सब
या फिर अब भी,
महसूस होता है
तेरा होना।
पिघलते शाम की रौशनी में
हवाओं को मदहोश मान
बढ़ते ठहरते,
समंदर के हज़ार लहरों में
मतवाली नाव को ढीठ जान
गिरते संभलते,
किनारे पर पहुंच अकेले में
पांवों पर रेत की मर्ज़ी मान
बैठते उठते,
मेरा खोना।
मनगढ़ंत बातें हैं ये सब
या फिर अब भी,
महसूस होता है
तेरा होना।
बिस्तर की खोई सिलवटों में
बेइमान बेहिसाब ज़िद का
रंगत बदलते,
ख़ामोशी पर ठहरे जवाबों में
ज़हन के हज़ारों सवालों का
शोर करते,
करवटों से उलझी रातों में
मुरझाई गहरी नींद का
पलकें झपकते,
रिहा होना।
मनगढ़ंत बातें हैं ये सब
या फिर अब भी,
महसूस होता है
तेरा होना।
कहीं धूमिल पुरानी डायरी में
स्याह से गढ़ी कविताओं का
इशारा करते,
नज़ारों को तकती नज़रों में
भरी बेशुमार बिसरी यादों का
आहें भरते,
सीने के भीतर कहीं कोने में
मौत से कहीं जवां ज़िदंगी का
राह चलते,
यूँ ही रोना।
मनगढ़ंत बातें हैं ये सब
या फिर अब भी,
महसूस होता है
तेरा होना।
