तेरे लाज़मी सवालों से

खामोश मेरे अफसानों का,

बेतुकी तेरी उलझनों से

मेरे मासूम इरादों का,

तेरे चेहरे पे ठहरे नूर से

मतवाली मेरी धड़कन का,

हैरान तेरी आवाज़ से

परेशान मेरे जज्बातों का

कोई रिश्ता तो ज़रूर है।

कभी कहता हूं।

कभी बढ़ नहीं पाता।

गढ़ता हूं शब्दों को मगर

कभी बस पढ़ नहीं पाता।

कभी खामोश खयालों में ही बस

तुमसे बातें हो जाती है।

कभी लगता है,

तुम सामने ही हो

और शाम से रातें हो जाती है।

कभी तेरे स्पर्श की यादें

मेरे आज को संवार देती है।

कभी तुम्हारा ना होना

होने का एहसास देती है।

अब मुकम्मल था या नहीं कि

इश्क़ हमारा,

इसका जिम्मा दुनिया के सर रहने दो।

भला कौन बांधने पाए

इस इश्क़ को

इसे खुली हवा में बहने दो।