नाम दर्ज आज तक
एक थप्पड़ नहीं,
जो हमपर उठाया हो।
या कि गुस्सा ही कोई,
जो अनायास बरस पड़ा हो।
एक याद भी नहीं ऐसी कि
चाहत रही एक खिलौने की
और पूरी ना हो पाई हो।
कितना कुछ है ना,
जो हम समझने में असमर्थ हैं?
कब हम बदले?
कब परिस्थिति?
कब हावी होने लगा आज,
बीत चुके उस कल पर?
कब प्रबल हुई जवानी अब की
धूमिल उस बचपन पर?
छिड़ गई जब
कल बहस एक
पापा से थी किसी बात पर,
वो पहली दफा शायद
चिल्ला कर बोल रहे थे मुझसे।
मगर सब सुना नहीं अच्छे से,
आखिर क्या कह रहे थे मुझसे।
वजह, मैं उनसे ऊंचा बोल रहा था।
मगर अक्सर मेरे साथ
यही कहानी होती है,
भूल कर देने के बाद
महसूस वो नादानी होती है।
नादानी शायद एक शब्द मात्र है
खुद की गलती छुपाने को,
वो बातें जो कह दी उस रोज़
बदतमीजी सही होगी कहलाने को।
ये किया क्या?
ये किया क्यों?
शायद ये कहानी रह जाए।
कद बड़ा था उनका
माफ किया उन्होंने मगर
शायद ये ग्लानि रह जाए।
मेरी माफी मांगने पर
उनके जवाब से
मैं इस कदर हैरान था,
मैं घंटो भर तक रोया था और
उनके मन में न एक तिनका अपमान था।
कैसे?
कैसे इतना बड़ा हृदय
आखिर कोई रख सकता है?
बच्चों की खातिर, जो जिया हमेशा।
एक बाप ही ऐसा कर सकता है।
एक बाप ही ऐसा कर सकता है।


