कुछ गुज़रे दिन।
फिर बीते महीने।
शिकायतों भरे ख़त,
जो ना तुमने लिखे।
ना पढ़े मैंने।
मगर शायद,
सुना किसी ने।
किसी ने पढ़ा।
उस बेचैनी को, सुना किसी ने।
उस मायूसी को, किसी ने पढ़ा।
या फिर कि लिखा ही हो,
किसी ने उस इंतज़ार को।
हाँ शायद,
किसी मचलती दोपहर ने
ये शिकायतें लिखी-पढ़ी होंगी
किसी शाम के कानों में।
यकीनन।
कहीं तब जाकर
तो ये रात हुई,
आज फिर
ख्यालों में
मेरी तुमसे बात हुई।
