कभी जब कभी ठहर सा जाता हूं

जीवन की तूफानी आंधियों में.....

तब पूछता है खुद की गहरी सांसों से

क्या यह जीवन है?


बिना अवरोध के तैरती जिंदगी

जब आंसुओं के घाट किनारे डूबती है,

तब पूछता हूं शाम ढलते सूर्य से

क्या तू भी मेरे जैसा है?


इतना स्पष्ट सा दृश्य होता है सब कुछ

जब हम अकेले होते हैं,

शायद बहुत दूर....

क्षणभंगुर संसार की चक्र की परिधि से|


कितना आहिस्ते से बिखरता है वो सब कुछ

जिसे हमने किसी मुस्कान पर शुरू किया था,

शायद बनारस की तंग गलियों सी जिंदगी में

हम गंगा की शांति भूल जाते हैं|


हार और जीत की इस झील में

भावनाओं के जल सूख जाने पर,

जब जीवन मछलियों की भांति विदीर्ण

तथा मौन हो जाता है

तब हम पाते हैं कि कुछ फर्क नहीं ,

हममें

और घाट किनारे पड़े उन मौन पाषाणों में|


जब घाट किनारे पसरी नदी

समेट लेती विश्व विजेता सूर्य को भी,

तब हम पाते हैं कि कुछ अंतर नहीं होता

सब कुछ जीत लेने में तथा सब कुछ हार जाने में|

                      

   ~अनुराग अंकुर