ये तेरा ही कुदरत को दिया हुआ है, जो तुझको उसने लौटाया है

 

एक शहर नहीं एक देश नहीं, पूरी दुनिया के लिये कुदरत ने संदेश पहुँचाया है।

हर पल-हर घडी दौड रही थी दुनिया, सब कुछ उसने अचानक रूकवाया है।।

 

हुए जमीन, आसमान या समुद्र शांत, कोलाहल का नामोंनिशान नजर नही आया है।

इंसानी स्वार्थ का शिकार हुई थी प्रकृति, उसको सुकून का लम्हा लौटाया है।।

 

इंसान की आँखों पर थी विकास की पटटी, कुदरत ने पटटी खोल आज आइना दिखाया है।

इनसानियत भूल कर मशीन बन बैठा था, उसको इंसान होने का अहसास अब कराया है।।

 

ये इंसान को कुदरत का दिया हुआ इशारा है, उसके बिना न कोई आने वाला कल अब हमारा है।

अपने कर्म पर विचार करने का कह कर, महाविनाश रोकने का अन्तिम अवसर दिखाया है।।

 

माना के आज मौत का मंजर बहुत भयावह है, पर तेरा दिल क्यों ये देख के घबराया है।

याद कर वो अपना बीता कल तू भी, जब बेबस जीवों से तू ने अपनी भूख को मिटाया है।।

 

जिस कुदरत ने तुझे अपनी गोद मे पाला, तेरे अच्छे और बुरे दोनों स्वरूप को दुलारा।

आज जब इसी कुदरत को तुने ललकारा, जवाब उसका रौद्ररूप में अब ये आया है।।

 

प्रकृति का सुन्दर रूप मिला था इंसान को, अपने स्वार्थ की ख़ातिर उस को बदसुरत बनाया है।

पहले सुनी नहीं दर्द भरी चीख कुदरत की, अब क्यों कुदरत के कोप से तू घबराया है।।

 

ये तेरा ही कुदरत को दिया हुआ है, जो तुझको उसने लौटाया है।

ये तेरा ही कुदरत को दिया हुआ है, जो तुझको उसने लौटाया है।।

---------- अनुज गुप्ता

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