वक़्त का खेल
ना वक़्त का खेल किसी ने समझाना वक़्त कभी किसी के हाथ आया
बचपन से जवानी, फिर आया बुढ़ापापर ये वक़्त कभी ना रुकने पाया...१
बचपन में चाहा जवानी को जल्दी
जवानी ने फिर बचपन याद दिलाया
ये कैसा खेल वक़्त ने रचायाआज से ज्यादा बीता या अगला भाया...२
हम वक़्त को कभी कोसते रहेजब बुरे वक़्त ने अपना रंग दिखाया
ये कभी ना हमने यु सोचा समझा
जो हमने बोया वहीं तो अब पाया...३
एक वक़्त जिन्दगी ने ऐसा भी दिखायासुविधा और दौलत से खुद को कम पाया
पर उसके पल पल को यादगार बनाया
इसी वक़्त को याद कर ताउम्र मैं मुस्कुराया...४ना करो यारोंं वक़्त से कोई गिला शिकवा
इसने तो हर पल अपना साथ निभाया
समय बुरा हो या अच्छा जिंदगी का
हर बार इसी ने हर मुश्किल से पार लगाया...५
ना वक़्त का खेल किसी ने समझाना वक़्त कभी किसी के हाथ आया
बचपन से जवानी, फिर आया बुढ़ापापर ये वक़्त कभी ना रुकने पाया...१
---अनुज गुप्ता


