उडान परिंदो की देखी तो एक ख्याल दिल में आता है।

आसमान में आजाद मुक्त उडना उनको बहुत सुहाता है।

सभी दिशायें उसकी है जहाँ चाह रखे उड़ जाता है।

अपनी मर्जी का मालिक है अपने दिल से राह बनाता है।


इंसान विवश हर मोड उसका विचार गुलाम हो जाता है।

आजादी तो सिर्फ एक ख्याल है जो दिल को बस बहलाता है।

रूकना चलना जब होता है बस जरूरतों का सवाल आता है।

अपनी मर्जी की बात कहाँ, जरूरतों के आगे वो झुक जाता है।


परिंदा को हर दिन नयी उडान से कुछ नया सबक मिल जाता है।

हर दिन हर पल को वो शिद्दत से जी कर हम को दिखता है।

शाम ढले फिर घर लौट कर अपने बच्चो को सब सिखाता है।

सुबह सबेरे होते ही नये दिन फिर नयी उडान पर जाता है।


इंसान अहम मे अंधा बन सारी सीख भुला है।

युग मशीन से भरा हुआ, रिश्ते को यु ही कुचलता जाता है।

बच्चे कैसे पलते है ये अब बुजुर्ग नही समझा पाता है।

उनका मोबाइल और टीवी से बहुत ही गहरा नाता है।


परिंदा का जीवन कुछ हम को यु सिखाता है।

फिकर नही अगले पल की न बीते मे वक्त गवाता है।

सब कुछ भूल आज में ही जीना बार बार यही दोहराता है।

अपनी मेहनत के दम से हर दिन एक जीत बनाता है।


इंसान परिंदा की तुलना में ज्यादा बुद्धिमान कह-लाता है।

इस बुद्धि के बल से ही वो दुनिया को झुका जाता है।

जिंदगी गुजर जाती है यु ही दूसरों को बस हरा-ने में।

समझ आये सच इससे पहले हाथ से वक्त फिसला जाता है।


उडान परिंदो की देखी तो एक ख्याल दिल में आता है।

आसमान में आजाद मुक्त उडना उनको बहुत सुहाता है।

सभी दिशायें उसकी है जहाँ चाह रखे उड़ जाता है।अपनी मर्जी का मालिक है अपने दिल से राह बनाता है।

---------- अनुज गुप्ता