संघर्ष से एक मुलाकात


हम चलें जीवन की डगर खुशियों की पोटली लिए।

संघर्ष ने मुझे तभी यु ही टोका एक ओर खड़े हुए।।

कहा मुझे, मुझसे भाग के कहा जाएगा।

वादा हैं मेरा तुझसे, हर पल मुझे साथ पाएगा।।...१


वो अपनी बात पर अडिग था हर बार रहा।

गर्व से अपना सीना किये था चौडा रहा।।

अनगिनत विजय गाथाओ से था वो भरा।

मैं उसके आगे था बहुत छोटा सा दिख रहा।।...२


थोड़ा सा साहस मैंने मुझमें फिर जगाया।

तू क्यू बीच में खड़ा ये उससे सवाल उठाया।।

क्यों तुझे देख मुझमें बेवजह डर समाता हैं।

क्यों मेरा साहस तेरे सामने बेदम हो जाता हैं।।...३


हैरान हुआ मेरे सवाल पर और मुझ देख हसता रहा।

कैसा मूर्ख हैं मंजिल तय की संघर्ष से तू अनजान रहा।

बिना संघर्ष को जाने जीवन का सफर कर रहा हैं।

बिना इसके जिया जीवन तो अर्थविहिन रहा हैं।।...४


मुझे सहमा देख उसने खुद से मेरा परिचय कराया।

खुद को पथ में मेरी मंजिल का सुत्रधार बताया।।

मेरी सारी सफलताओ का आधार खुद में दिखाया।

‘‘संघर्ष से ना भागना जीवन में‘‘ कह फिर वो मुस्कुराया।।...५


जो तू मुझे अपने जीवन में सहर्ष अपनायेगा।

मेरा अस्तित्व तू फिर खुद जान जाएगा।।

सुख एक मृग मरीचिका हैं, जाल में ना फसना।

वरना जीवन के रहस्य से अनजान खुद को पायेगा।।...६


---अनुज गुप्ता