प्रकृति ने दिया मनुष्य का साथ हरपल ,

फिर भी है मनुष्य इससे बेपरवाह पलपल।

जीवन की उम्मीद है इसी से हरदम,

फिर भी रहता है वो बेख़बर इससे हरकदम।।

सुविधा की चाहत आज इसपर है हावी,

न देख पा रहा है कल होने वाली बरबादी।

जब कल न होगें ये पेड न मिलेगी हरियाली,

ताजा हवा के लिये भी होगी सब में मारामारी।।

चेत जाओ आज तो कल ख़ूबसूरत मिलेगा,

वरना ये आज भी कल बस सपने में खिलेगा।

देखोगे नजरें घुमाके मकानों की भीड़ पाओगे,

पेड पौधे फिर घर के फोटो फ्रेम में दिखाओगे।।

कही जंगल जल रहे है कही धरती फट रही है,

ये सब देख कर तो शायद तुम समझ जाओगे।

प्रकृति की सुविधा को गलत फायदा उठाओगे,

पर्यावरण के साथ खुद को बस संकट में पाओगे।।

प्रकृति ने तुम को जब माता बन स्वीकार किया है,

समझो ये की तुम को पुत्र समझ के पालन किया है।

प्रकृति के इस भाव को जब तुम भी समझ जाओगे,

जो संतुलन बिगडा है उसको फिर से बना पाओगे।।

प्रकृति का अस्तित्व यहाँ जब सिमट जायेगा,

कहो तुम्हारा जीवन क्या यहाँ बच पायेगा।

बदलते मौसम चक्र और उबली धरती है यहाँ ,

मनुष्य की लालसा के आगे खत्म सब हो जायेगा।।