पिता

दो अक्षर का मेल हुआ, जिंदगी का सार यही समझ आया।

जिंदगी के पहले कदम रखने में जिसने मेरा साथ निभाया।।

जिंदगी के हर कदम पर जिसको पल पल अपने साथ पाया।

वो पिता थे जिनके अनुभव और सीख से मैने मंजिल को पाया।।...१

माना माँ ने जन्म दिया मेरे लिए अपना जीवन अर्पण भी किया।

पर पिता के त्याग और समर्पन ने मेरे जीवन को सफल बनाया।।

पहचान मिली इस जग मे जो वो पिता के नाम का है साया।

पिता का नाम आगे ही आगे बढ़े यही ख्याल मेरे दिल में समाया।।...२

अपने सपनो की बलि चढ़ा कर मेरे सपनो को पूरा कराया।

मेरी इच्छाओ की खातिर अपनी हर इच्छा को दिल से मिटाया।।

अपनी भूख से पहले मेरी भूख का ख्याल उनके दिल में आया।

पिता होने का फर्ज उन्होने पूरी शिद्दत और दिल से निभाया।।...३

चोट मुझे लग जाती तो दर्द का अहसास उसमें क्यों समाता।

जीत कभी मेरी होती तो गर्व से वो क्यो भर जाता।।

हार में मेरी वो शामिल हो कर हर बार होसला मेरा बढ़ाता।

मेरे हर अहसास को वो अपना समझ मुझसे हर पल जुड़ जाता।।...४

आज खुद पिता बन कर मेरे अहसास मेरे पिता से जुड़ जाते हैं।

जो उनके ख्याल थे कभी सब मुझ में आज समाते है।।

उनके दिये हुए अनुभव सब आज याद दिलाते हैं।

पिता कैसा बनना है वो अब यादों में मुझे सिखलाते है।।...५

दो अक्षर का मेल हुआ, जिंदगी का सार यही समझ आया।

जिंदगी के पहले कदम रखने में जिसने मेरा साथ निभाया।।

जिंदगी के हर कदम पर जिसको पल पल अपने साथ पाया।

वो पिता थे जिनके अनुभव और सीख से मैने मंजिल को पाया।।...१


---अनुज गुप्ता