मैं गाँव हु और तू मुझको यु गवार कहता है।

 

मैं गाँव हु और तू मुझको यु गवार कहता है।

बेपनाह वक्त है यहाँ तो तू मुझे यु बेकार कहता है।।

ए शहर तेरा अखबार ही तेरे बुरे होने की बात कहता है।

आँखों पर पटटी और बस भागते लोगो को तू समझदार कहता है।।...1

 

यहाँ वक्त का पता भी नही चलता है।

दिन गुजर जाता है यु हंसते और गाते।।

हर कोई यहाँ हर किसी को अपना परिवार कहता है।

और इस गाँव को तू यु गवार कहता है।।...2

 

तेरे शहर की हकीकत को क्या बया करू।

तेरी सारी फुर्सत को तू इतवार कहता है।।

थका हुआ चेहरा और ये भीगी नम आँखें है।

और गम छिपाके मुस्कुराने को जिम्मेदार कहता है।।...3

 

रिश्तो को निभाने का आधार मोबाइल और मीडिया है।

इस मशीनी युग को कैसे तू शिष्टाचार कहता है।।

अकेले रह कर मुश्किल हालत को मंजूरी देता है।

पर एक जुट परिवार की बदिशों इन्कार कहता है।।...4

 

बच्चे बड़े बुर्जुगो का आदर सम्मान भुले बैठे है।

इसे तू पढ़े लिखे शहर का संस्कार कहता है।।

गाँव आज भी अपनी संस्कृति को गर्व से अपनाता है।

और तू सभ्यता भुल के खुद को शहर बार-बार कहता है।।...5

 

मेरे गाँव में आज भी इनसानियत का बोलबाला ज्यादा है।

इनसानियत के आगे मेरा गाँव धन दौलत से इनकार कहता है।।

शहरी जिंदगी का आधार है जरूरत, धन दौलत और जमीन।

और तू दिल से गरीब शहर के अमीर होने की बात कहता है।।...6

 

मैं गाव हु और तू मुझको यु गवार कहता है।

बेपनाह वक्त है यहाँ तो तू मुझे यु बेकार कहता है।।

ए शहर तेरा अखबार ही तेरे बुरे होने की बात कहता है।

आँखों पर पट्टी और बस भागते लोगो को तू समझदार कहता है।।...1

---------- अनुज गुप्ता

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