इस तरह ऐ जिन्दगी तेरे करीब होता चला गया।

वक्त गुजरा और मै मौत के करीब होता चला गया।

इस दरमियाॅं कुछ रिश्तों के बीच खाई सी खुद रही थी।

उसी दरमियाॅ कुछ खुदी हुई खाईयों को मै भरता चला गया।

जब भी कभी मेरा घरौदा उजडा समय की आंधी से।

हर बार वक्त के तुफानो को मै तोड चला गया।

कितने दौर गुजरे और वक्त ने अपने चेहरे बदले। 

हर दौर से गुजरा और घरौदा बनाने में माहिर होता चला गया।

कभी बहुत कौसा अपने नसीब को मैने दिलो दिमाग से।

कभी दिल रो दिया जिन्दगी के खस्ता बुरे हालात पे।

फिर दर्द से उबरा और भाग्य का रकीब होता चला गया।

इस तरह ऐ जिन्दगी तेरे करीब होता चला गया।

वक्त गुजरा और मै मौत के करीब होता चला गया।

---- अनुज गुप्ता