होली कल और आज
वक्त बदलता यु जाता है क्यों फिर कोई समझ नही पाता है।
समय के साथ क्यों हर रस्म रिवाज़ नये रंगों में ढल जाता है।।
आज फिर बचपन की होली मेरी यादों में घर कर जाती है।
क्यों यादें उस रंग भरी महफिल में बरसों पीछे फिर जाती है।।...1
मैं त्योहार एक था न धर्म और समाज के बीच मुझे बांटा जाता था।
हर व्यक्ति विशेष मुझ में शामिल हो कर मुझे दिल से मनाता था।।
रिश्तों में गुजियों की मिठास थी दिल से दिल घुल जाता था।
सब इक दूजे से मिलते थे हर छोटा, बडों से आर्शिवाद पाता था।।...2
त्योहार होली का हो और समा महीने भर पहले ही बन जाता था।
गले लगा के बुरा भूल आने वाले कल को बेहतर बनाया जाता था।।
पास पडोसी सब के साथ मिलकर गुझिया बनाने माहौल भी आता था।
आज बनी इस घर में तो कल दूसरे घर फिर ये समा बनाया जाता था।।...3
होलिका दहन का क्या कहना वो पूरे मुहल्ला मिलकर मनाता था।
होली जलती थी एक जगह और पुरा मुहल्ला वही मिल जाता था।।
मेरे इस त्योहार पर भांग से भरे प्याले भी सब रिश्तों में जोड लगाते थे।
इस भांग के रस में डूब कर सब के ईष्र्या द्वेष दिलों से मिट जाते थे।।...4
नाच गानों का एक दौर भी चलता था हर उम्र से सब शामिल हो जाते थे।
मस्ती में मस्त सभी होते थे पर मुझे सौहार्दपूर्ण रूप फिर भी मनाते थे।।
ख्याल यहाँ रख एक दूसरे का, भाईचारा और उल्लास का पाठ पढ़ाते थे।
धर्म समाज के बन्धन से दूर सभी एक रंग में रगे फिर नजर आते थे।।...5
वो बचपन की रौनक कहाँ गई, अहम इंसान का बड़ा युही हो जाता है।
दिल से दिल मिलने की बात नही, यहाँ सब के लिये बुरा भाव ही आता है।।
मैं सीमित हो चुका हुॅ घर तक, बाहर तो बस अब रस्म निभाई जाती है।
अब होली जलती है हर गली गली, एक होने की वजह साथ जलायी जाती है।।...6
वक्त बदलता यु जाता है क्यों फिर कोई समझ नही पाता है।
समय के साथ क्यों हर रस्म रिवाज़ नये रंगों में ढल जाता है।।
आज फिर बचपन की होली मेरी यादों मे घर कर जाती है।
क्यों यादें उस रंग भरी महफिल में बरसों पीछे फिर जाती है।।...1
---- अनुज गुप्ता


