ढूंढ रहा हूं राम इस जग में
ढूंढ रहा हूं राम इस जग में, रावण हर पग मैं पाता हूं।
प्यार भरे हर चेहरे को देख, हर बार आशा से भर जाता हूं।।
जलन, ईर्ष्या से भरा जग, ये देख फिर सहमा जाता हूं।
हैं वक्त का कैसा दौर यहाँ, खुद में रावण अब पाता हूं।।...१
सोच सच्ची रख के चला, क्यों अब मैं बदला जाता हूं।
रंग ढंग दुनिया के देख के, क्यों अब वैसा भेस बनाता हूं।।
सीता की रक्षा करनी हैं, पर क्यों राम खुद मैं नहीं पाता हूं।
बात राम की करता हूं, पर रावण के पक्ष मैं गाता हूं।।...२
हैं जग की हर सीता को खतरा, राम में रावण को छिपाता हूं।
राम को मैं स्मरण करता नहीं, रावण को महान बनाता हूं।।
मर्यादा की चादर छोड़ चुका, अब मर्यादा में बंधन पाता हूं।
राम बन हर पल सहना हैं, अब रावण के रूप मैं बनाता हूं।।...३
सतयुग के रावण को देखूं, तो उसे खुद से बेहतर पाता हूं।
मान और मर्यादा उसमें थी अच्छी, मैं खंजर पीठ में चलाता हूं।।
दिखने में सज्जन सहज हूं मैं, पर ईर्ष्या से घिर जाता हूं।
राम मैं बन नहीं पाता हूं, रावण से भी नीचे गिर जाता हूं।।...४
खुद को अब यू समझाता हूं, इनसानियत को फिर से आजमाता हूं।
मैं जाग गया तो जग जागा, ये सोच के कदम बढ़ाता हूं।।
आने वाली पींडी की सोच, कल का बीड़ा आज उठाता हूं।
सतयुग की इच्छा फिर करता हूं, फिर खुद में राम जगाता हूं।।...५
---अनुज गुप्ता

