बुढ़ापे से लाचार



कभी कभी सोचता हूं क्या मैं एक लाचार हूं।

एक अदद नौकरी की चाहत में बैठा एक बेकार हूं।।

कभी बेटे की बदली सोच से आहत दिखता हूं।

कभी अपनी बीमारी से घिरे शरीर का शिकार हूं ।।...१


वो जवानी के दिन जो बहुत शानदार थे।

ना कमी थी कोई, जिंदगी खुशियों का बाज़ार थी।।

सभी हर तरफ दीवाने थे, सब की आँखों के हम तारे थे।

वक्त बुरा होगा ना ऐसी उम्मीद कभी एक बार थी।।...२


मेहनत एक जुनून बन दिल में समाई थी।

सच्चाई से जीवन गुजरने की कसम उठाई थी।।

ना परिवार को कोई कमी हो ये सोच जो आई थी।

परिवार भी लाचार हो सकता हैं मुझसे ना बात समझ आई थी।।...३


जिंदगी की दौड़ में ना जाने कब मायने सब के बदल गए।

दुनिया में तो सफल और परिवार से कुछ दायरे बन गए।।

मांगा था अपनो ने मुझसे बस उँगली पकड़ने का सहारा।

हम सब को अपने कंधे पर बैठकर सफर तय करते गए।।...४


खुद मेरा परिवार अब ना जाने क्यों मुझसे कतराता हैं।

दुनिया में हर कोई मुझसे महज़ फोर्मलिति निभाता हैं।।

अपने दिल की कहने में मन मेरा रुक क्यों जाता हैं।

मेरा घर आज धर्मशाला में रहने का अहसास दिलाता हैं।।...५


बर्दाश्त की ये हद हैं दर्द और मुझसे अब सहा नहीं जाता हैं।

अकेलेपन और तन्हाइयो से ना जाने क्यों रिश्ता जुड़ जाता हैं।।

ना किसी की बातें सुनने का अब आलम बनता हैं।

ना अब किसी से कुछ और मुझसे कहा जाता हैं।।...६


बुढ़ापा एक तरफ तो तजुर्बे का खजाना कहलाता हैं।

पर इसको गुजारने में हर गम से इंसान गुजर जाता हैं।।

अगर अहसास वक्त से पहले इस पल का भी हो जाता हैं।

इंसान जीते जी उस पल में यु ही शायद मर जाता हैं।।...७


---अनुज गुप्ता

बरेली (उत्तर प्रदेश)

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