आरक्षण की आग


आरक्षण जैसे राजनीति से फैली हुई बिसात।

इसमें नेता और राजनीति दोनों थे इक साथ।।

प्रजा को हर पल इससे जुड़ी हुई थी आस ।

पर सच में ये थी बस एक कोरी बकवास।।...१


था एक मायाजाल जो ना कोई समझ पाया।


आजाद भारत का बस अभी जनम हुआ।

पिछडे और गरीब का सबको स्मरण हुआ।।

आरक्षण को उनके लिए आधार था बनाया।

राजनीति के लिए एक नया हथियार जो आया।।...२


था एक मायाजाल जो ना कोई समझ पाया।


आरक्षण को बहुत से हिस्सों में बाट दिया।

जातिगत, प्रबंधन, लिंग और धर्म का नाम दिया।।

सच्चे ज़रुरतमंद को इसके बाद भी ठेंगा हाथ आया।

आरक्षण वोट पाने का मुद्दा भर कहलाया।।...३


था एक मायाजाल जो ना कोई समझ पाया।


जो सही योग्य था उसे गरीबी ने यु हराया।

आरक्षण का सही हकदार गरीब और विकलांग को पाया।।

पर गरीबी छोड़ के हर तरह से आरक्षण आजमाया।

उसमें नेता ने अपनी राजनीति का घाटा पाया।।...४


था एक मायाजाल जो ना कोई समझ पाया।


जनता की आँखों पे बँधी थी जो इक पट्टी।

हटा पट्टी अब खुद को अपना सच दिखलाया।।

इस देश के युवा देखो सुनहरा कल फिर आया।

मूर्ख बने बहुत, समझदार होने का मौका अब आया।।...५


था एक मायाजाल जो ना कोई समझ पाया।


बहुत जल चुका देश आरक्षण की आग में।

हो कर सब एक आरक्षण को लायक तक पहुचाये।।

हमें तोड़ने वाले को अब मिल कर सबक सिखाये।

फर्जी नेता और राजनीति दोनों को अब रास्ते पर लाये।।..६


बहुत हुआ अब मायाजाल, इसे तोड़ अब देश और खुद को बचाये।



---------- अनुज गुप्</div><div class=