अब देश का सवाल है
जन गण की पुकार है, युद्ध का बस विचार है।
धरती का सवाल रख, लहू को अपने लाल कर।
जान की न फिक्र हो, बस देश का अब जिक्र हो।
जिंदगी को अपनी फिर इस देश पर ही वार कर।1
धनुष उठा के बाण चढ़ा, प्रत्यंचा अब तैयार कर।
शंखनाद हो चुका है, तिलक ललाट पर लगा।
प्राण की आहुति को खुद को बस तू तैयार कर।
शक्ति भरी हुंकार से शत्रु में भय का संचार कर।2
इस तरह तू प्राण ले की वीरता का भान दे।
शत्रु भयभीत हो और इसी में तेरी भी जीत हो।
प्रहार ऐसा कर कि तू ही एक सर्वशक्तिमान है।
युद्ध में जो लड रहा वही तो बस महान है।3
जीत की बस भूख हो मौत से अब प्रीत हो।
दर्द का दबा हो भाव, शौर्य का चुनाव कर।
दुश्मनों की मौत बन, न यहाँ दया का भाव कर।
विजयभाव रख यहाँ, न अपने घाव पे मलाल कर।4
मस्तकों को काट कर, धरती लहू से लाल कर।
अपनी सिंह गर्जना को आस-मां में विस्तार कर।
नसों में भर के जोश, तेज रक्त का बहाव कर।
दिल की धडकनों को आज देश की आवाज कर।5
जिंदगी के सुख को छोड़, इनका भी अब त्याग कर।
अपने परा-ये का भेद छोड़, न इसका अब विचार कर।
जिंदगी है प्रेम गीत, इससे अब तू इनकार कर।
देश ही सर्वस्व है बस तू इतना सा ख्याल कर।6
जन गण की पुकार है, युद्ध का बस विचार है।
धरती का सवाल रख, लहू को अपने लाल कर।
जान की न फिक्र हो, बस देश का अब जिक्र हो।
जिंदगी को अपनी फिर इस देश पर ही वार कर।1


