दिन भर की थकान से चूर रात को वैसे ही पड़ जाता हूँ
जैसे की एक मुर्दा लेटा हो मुर्दा शय्या पर
मुर्दे को मृत्यु के बाद दी जाती है मुखाग्नि
पर मैं ठीक वैसे ही हर सुबह जाग उठता हूँ
अपने अंदर लगी आग को बुझाने की चाह में
दौड़ता हूँ, चलता हूँ, थकता हूँ पर रुकता नहीं।

न जाने कितनी चाहतों को अपने अंदर लिए
हार थक के भी काम करता हूँ
कभी मुझमें चाहत होती है उन सभी सपनों को पूरा करने की
तो कभी ज़रूरतों को पूरा करने की जदोजहद में खुद से भी लड़ जाता हूँ
थकता हूँ, थोड़ा रुकता हूँ पर कभी हार नहीं मानता।

कभी थोड़ी निराशा भी होती है हावी मुझ पर
लेकिन हाँ थोड़ी देर में ही उठ खड़ा होता हूँ
ठीक वैसे ही जैसे एक स्खलित आदमी का कामोत्तेजना की चाह में फिर से खड़ा हो जाना
ऐसे ही रोज़ दौड़ता हूँ, चलता हूँ, थकता हूँ पर रुकता नहीं।।