- जज्वात बिक रहे खुले बाजार में !
हम अपनत्व ढूँड रहे वैश्याओ के व्यापार में !
काश पडोसी से भी बन्दगी हमारी होती!
तो बहुत सारे अपने होते इसी शहर में !!
मगरूफ हम हैं ,दुनिया के शोर में !
खुद भी गिरे ,और गिराया ,दिखावे के जोर में !!
अब न आता है कोई अश्क बहाने !
चाहे निकले जनाजा, या दर्द -मरोड़ में!!
खुद की कीमत समझो इस बहार में!
इन्सा बने हो, बर्षो हजार में !!
अहम का मुखोटा बदल डालो !
काम आओ दूजे के,इस संसार में !!
जज्वात बिक रहे खुले बाजार में!