1. जज्वात बिक रहे खुले बाजार में ! हम अपनत्व ढूँड रहे वैश्याओ के व्यापार में ! काश पडोसी से भी बन्दगी हमारी होती! तो बहुत सारे अपने होते इसी शहर में !!
मगरूफ हम हैं ,दुनिया के शोर में ! खुद भी गिरे ,और गिराया ,दिखावे के जोर में !! अब न आता है कोई अश्क बहाने ! चाहे निकले जनाजा, या दर्द -मरोड़ में!! खुद की कीमत समझो इस बहार में! इन्सा बने हो, बर्षो हजार में !! अहम का मुखोटा बदल डालो ! काम आओ दूजे के,इस संसार में !! जज्वात बिक रहे खुले बाजार में!