ख़ुद ख़्याल में हूँ
या ख़्याल कर रही हूँ
सवाल में उलझा सवाल कर रही हूँ
जो सफ़र में ही रहते है
उनसे हाल क्या कहिए?
मैं तो बिन सफ़र ही
सोच में कमाल कर रही हूँ
मुझसे पूछ लो या रोक लो
कुछ कह कर यूँ हीं
में तो हूँ अनजान रास्तों का मुसाफ़िर
साहिलों पर आग कर रही हूँ
बुझ गई है जो इंतज़ार की लौ
फिर क्यों बग़ावत इन हवाओ से
मैं बार बार कर रही हूँ।।
-अनुजा
