मैंने ना जाने कितनी ही सर्दियों को

इन गुज़रते सालों में बसंत होते देखा है

जो जुड़े थे कभी मज़बूती से

अपनी अपनी शाख़ों से

उनको वक़्त की हवाओ में

धूल होते देखा है

जिनको कभी डर था वो गिरेंगे

बड़ी ही ज़ोर से

उनको बिना डोर की

पतंग होते देखा है

जाने कौन कौन से मंज़र अभी बाक़ी हैं

मैंने तो बंद आँखों से भी

ना जाने कितनी ही काली सर्द रातो की

सुनहरी भोर होते देखा है

मैंने कितनी ही सर्दियों को बसंत होते देखा है

  1. अनुजा