सोचा है अपने लिए थोड़ा ज़्यादा
और ग़मों से परे होकर
सोचा है थोड़ा मतलबी होकर
मंज़िले वही है रास्ते बदले हैं
और देखा है थोड़ा ख्याल बदलकर
सुनी है पहली दफ़ा दिल की
दिल्लगी भी की मौसम देख कर
है यक़ीन बदलेगा वक़्त भी
फ़िलहाल देखा है हाल बदलकर
सोचा है थोड़ा खुदगर्ज़ हो जाऊँ
समुन्दर के तुफान भी देख लूँ किनारे होकर
-अनुजा
